9 लाख से ज़्यादा ए पी एल राशनकार्ड धारकों को  राशन की कीमतों में की गई वृद्धि का निर्णय  जनविरोधी :संजय चौहान सीपीआई एम

9 लाख से ज़्यादा ए पी एल राशनकार्ड धारकों को राशन की कीमतों में की गई वृद्धि का निर्णय जनविरोधी :संजय चौहान सीपीआई एम


भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) प्रदेश सरकार द्वारा कैबिनेट बैठक में राशन में दी जाने वाली सब्सिडी में कटौती व 9 लाख से ज़्यादा ए पी एल राशनकार्ड धारकों को दिए जाने वाले राशन की कीमतों में की गई वृद्धि के निर्णय की कड़ी निंदा करती है तथा इस जनविरोधी निर्णय को तुरन्त वापिस लेने की मांग करती है। सरकार के इस जनविरोधी व अतार्किक निर्णय से स्पष्ट हो जाता है कि सरकार महामारी की आढ़ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को समाप्त करने का कार्य कर रही है। इस निर्णय से पहले ही आर्थिक संकट से जूझ रहे गरीब मजदूर, किसान, ठेका व अन्य कर्मचारी तथा छोटा व्यापारी जो रोज मेहनत कर अपनी रोजी रोटी अर्जित करते हैं वो अत्यंत प्रभावित होंगे और इनका संकट और अधिक बढेगा। आज वैश्विक महामारी से पैदा हुई इस विषम परिस्थिति में जहाँ सरकार को आर्थिक संकट से जूझ रही जनता को राहत प्रदान करने के लिए कार्य करना चाहिए व राहत प्रदान करनी चाहिए थी वहीं सरकार जो कुछ छोटी मोटी मदद दे भी रही थी उसे भी महामारी के नाम पर छीन रही है।
आज देश व प्रदेश में सरकार द्वारा लॉकडाउन व कर्फ्यू लागू किये 50 दिन से अधिक समय हो गया है जिसके कारण अधिकांश मजदूरों, किसानों, ठेका कर्मचारियों, छोटे व्यापारियों व अन्य वर्गो का काम धंधा लगभग बिल्कुल बन्द रहा है और कोई भी कमाई नहीं हो पाई है। इसके कारण इनके सामने एक गंभीर आर्थिक संकट खड़ा होने से इनको रोजी रोटी से भी वंचित होना पड़ गया है। ऐसी विषम परिस्थिति में जहां देश व प्रदेशवासियों को सरकार से आर्थिक व अन्य रूप से राहत की दरकार है और प्रधानमंत्री ने देश मे 20 लाख करोड़ रुपये राहत के रूप में देशवासियों के लिए घोषणा भी की है। ऐसी स्थिति में प्रदेश सरकार द्वारा राशन की सब्सिडी में की गई कटौती का निर्णय बिल्कुल भी तार्किक व न्यायसंगत नही है। एक ओर प्रदेशवासी प्रधानमंत्री द्वारा घोषित राहत की इंतजार कर रहें हैं और इसके विपरीत प्रदेश सरकार के द्वारा इस घोषणा के एक दिन बाद ही इस राशन सब्सिडी में कटौती का निर्णय ले लिया जिसने प्रदेशवासियों को स्तब्ध कर दिया है।
प्रदेश सरकार का इस निर्णय के पीछे ये तर्क देना कि इससे प्रति वर्ष 71 करोड़ (जो कि कुल दी जा रही खाद्य सब्सिडी का लगभग 65 प्रतिशत है) की बचत होगी बिल्कुल ही अतार्किक व समझ से परे है। आखिर सरकार ऐसी वैश्विक महामारी से पैदा हुई इस विषम परिस्थिति में प्रदेश की आर्थिक संकट से जूझ रही आधी से अधिक आबादी को राशन को महंगा कर उसे इससे वंचित कर रही है। प्रदेश सरकार का यह निर्णय भारत के संविधान की मूल भावना व मानवाधिकारों का हनन है क्योंकि देश व प्रदेश की जनता को रोटी व अन्य मूलभूत आवश्यकताएं उपलब्ध करवाना सरकार का संवैधानिक उत्तरदायित्व है। प्रदेश सरकार यदि आज इस राशन में सब्सिडी में कटौती के पीछे अपनी आर्थिक दशा ठीक न होना कारण दे रही है तो इसके लिए सरकार द्वारा प्रदेश में अपनाई जा रही आर्थिक नीतियां ही जिम्मवार है। एक ओर सरकार अनावश्यक इवेंट व कार्यक्रम आयोजित कर, महंगी गाड़ियां की खरीद कर और अनावश्यक मद्दों पर फजूलखर्च कर करोडों रुपये लुटवा रही है और इसकी पूर्ति प्रदेश की आधी से ज़्यादा आबादी के राशन की सब्सिडी में कटौती करके कर रही है। सरकार का यह तर्क बिल्कुल भी जायज़ नहीं है क्योंकि इसका प्रावधान सरकार ने पहले ही बजट में कर रखा है। सरकार यदि गम्भीर आर्थिक संकट से जूझ रही है तो मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा धन को राशन में सब्सिडी के लिए प्रयोग में ला सकती हैं क्योंकि खाद्यान्न की उपलब्धता जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
सी.पी.एम.मांग करती हैं कि प्रदेश सरकार अपने संवैधानिक उत्तरदायित्व को ध्यान में रख कर इस खाद्य सब्सिडी में की गई कटौती के निर्णय को तुरन्त वापिस ले और बी पी एल, ए पी एल व सभी को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से सस्ता राशन उपलब्ध करवाए तथा इसका सार्वभौमिकरण किया जाए। आटा, चावल, दालों, चीनी, तेल व अन्य वस्तुओं की कीमतों में की गई वृद्धि तुरन्त वापिस की जाए। सभी को 10 किलो प्रति व्यक्ति के हिसाब से तीन महीने के लिए सस्ता राशन उपलब्ध करवाया जाए ताकि प्रदेश में इस विषम परिस्थिति से उत्पन्न संकट से जूझ रही जनता को रोजी रोटी उपलब्ध हो सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published.